chote राज्य बनाम बड़े राज्य के पछ में अपने अपने तर्क दिए गए हैं और दिए जा रहे हैं । मेरा यह मानना है की राज्यों के छेत्रिय पुनर्निर्धारण का आधार आर्थिक , प्रशासनिक एवं राजनितिक कुशलता होनी चाहिए न किभाषाई सामुदायिक पहचान । इसी सन्दर्भ में वर्तमान में उत्तर प्रदेश कि तरफ ध्यान दे तो हम पातेहैं कि उपरोक्त तीनो आधार पर प्रदेश की कार्यकुशलता ( विकास ) बड़े आकारके कारण बाधित हो रहा है । अत : उत्तर प्रदेश का छेत्रिय पुनर्निर्धारण जरुरी है । पर इसका मतलब यह नहीं है की हम अपनी पहचान को छोटे - छोटे टुकडो में खंडित कर दें ।मेरे दृष्टिकोण से प्रदेश का विभाजन तीन भागो में किया जाये -
१- पश्चिमी उत्तर प्रदेश , जिसकी पूर्वी सीमा पीलीभीत , शाजहानपुर , फतेहगढ़, मैनपुरी तथा इटावा जिले बनाये ।
२- बुंदेलखंड , जैसा की मांग की जा रही है ।
३- उत्तर प्रदेश -लखीमपुर , हरदोई,कन्नौज ,और्राया , अकबरपुर से लेकर बलिया तक। जिसकी राजधानीलखनऊ ही रहे ।
पूर्वांचल या भोजपुर की मांग उचित नहीं है। गर पूर्वांचल बनता है तो सर फुटव्वल राजनीति, मजदूर पैदा करने की छमता ही हासिल होगी और कुछ नहीं । और बिहार का है क्या? की जगह पूर्वांचल का है क्या? का तमगा ।
Thursday, February 18, 2010
Wednesday, February 10, 2010
खाद्यान्न उत्पादन
हमारी मुख्यमंत्री का कहना है की प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन दोगुना किया जायेगा । इस संदर्भ में मै सम्बंधित अधिकारियो का ध्यान भूमि व्यवस्था की और दिलाना चाहूँगा। हमारे प्रदेश में खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूमि पर दबाब बहुत ज्यादा है । आजादी के बाद भूमि सुधारो को हम अभी तक सही तरीके से लागू नहीं कर पाए । यही नहीं जोतो का आकार विखंडित होकर कम ही होता जा रहा है । ऐसे में चकबंदी जो की भूमि सुधारो का एक महतवपूर्ण तरीका है, को एक बार फिर से अपनाये जाने की जरुरत है । जिससे किसान जो भी जोत का आकार उनके पास बचा है , पर सही तरीके और कम लागत से खेती कर सके । यही नहीं जिन लोगो ने छोटे जोत के आकार के कारन खेती करना छोड़ दिया हे वह खेती करने को प्रेरित हो सके।
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